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Friday, April 24, 2015

श्री कृष्ण का मुंडन संस्कार की लीला - Sri Krishna



उस समय व्रज के लोगों का मुख्य व्यवसाय (profession) गौ-चारण ही था इसलिए मुख्य व्यवसाय से सम्बंधित कुछ वर्जनाएं भी थी।  अब इसे वर्जनाएं कहें या सामाजिक नियम बालक का जब तक मुंडन नहीं हो जाता तब तक उसे जंगल में गाय चराने नहीं जाने दिया जाता था।

अब तो हम काफी आधुनिक (modern) हो गये हैं या यूं कह सकते हैं अपनी जड़ों से दूर हो गये हैं नहीं तो हमारे
यहाँ भी बालक को मुंडन के पहले ऐसी-वैसी जगह नहीं जाने दिया जाता था। 

खैर....बालक कृष्ण रोज़ अपने परिवार के व पडौस के सभी पुरुषों को, थोड़े बड़े लड़कों को गाय चराने जाते
देखते तो उनका भी मन करता पर मैया यशोदा उन्हें मना कर देती कि अभी तू छोटा है, थोड़ा बड़ा हो
जा फिर जाने दूँगी।

एक दिन बलराम जी को गाय चराने जाते देख कर लाला अड़ गये –"दाऊ जाते हैं तो मैं भी गाय चराने
जाऊंगा....ये क्या बात हुई....वो बड़े और मैं छोटा ?" मैया ने समझाया कि दाऊ का मुंडन हो चुका है
इसलिए वो जा सकते हैं, तुम्हारा मुंडन हो जायेगा तो तुम भी जा सकोगे।

लाला को चिंता हुई इतनी सुन्दर लटें रखे या गाय चराने जाएँ। बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने सोचा
कि लटें तो फिर से उग जायेगी पर गाय चराने का इतना आनंद अब मुझसे दूर नही रहना चाहिए।
तुरंत नन्दबाबा से बोले –"कल ही मेरा मुंडन करा दो....मुझे गाय चराने जाना है।

नंदबाबा हँस के बोले –“ऐसे कैसे करा दें मुंडन....हमारे लाला के मुंडन में तो जोरदार आयोजन करेंगे."
लाला ने अधीरता से कहा –"जो करना है करो पर मुझे गाय चराने जाना है....आप जल्दी से जल्दी मेरा
मुंडन करवाओ। " 

मुंडन तो करवाना ही था अतः नंदबाबा ने गर्गाचार्य जी से लाला के मुंडन का मुहूर्त निकलवाया । निकट में अक्षय तृतीया का दिन शुभ था इसलिए उस दिन मुंडन का आयोजन तय हुआ। न्यौते बांटे गये कई तैयारियां की गयी। आखिर वो दिन आया. जोरदार आयोजन हुआ, मुंडन हुआ और मुंडन होते ही लाला मैया से बोले –"मैया मुझे कलेवा नाश्ता दो....मुझे गाय चराने जाना है । " मैया बोली –"इतने मेहमान आये हैं घर में तुम्हें देखने और तुम हो कि इतनी गर्मी में गाय चराने जाना है....थोड़े दिन रुको गर्मी कम पड़ जाए तो मैं तुम्हें
दाऊ के साथ भेज दूँगी । " 

लाला भी अड़ गये –"ऐसा थोड़े होता है....मैंने तो गाय चराने के लिए ही मुंडन कराया था....नहीं तो मैं
इतनी सुन्दर लटों को काटने देता क्या....मैं कुछ नहीं जानता....मैं तो आज और अभी ही जाऊंगा गाय
चराने । "   मैया ने नन्द बाबा को बुला कर कहा –"लाला मान नहीं रहा....थोड़ी दूर तक आप इसके साथ हो
आइये....इसका मन भी बहल जायेगा....क्योंकि इस गर्मी में मैं इसे दाऊ के साथ या अकेले तो भेजूंगी
नहीं । " 

नन्द बाबा सब को छोड़ कर निकले. लाला भी पूरी तैयारी के साथ छड़ी, बंसी, कलेवे की पोटली ले कर
निकले एक बछिया भी ले ली जिसे हुर्र....हुर्र कर चरा कर वो अपने मन में ही बहुत खुश हो रहे थे....कि आखिर
मैं बड़ा हो ही गया।  बचपन में सब बड़े होने के पीछे भागते हैं कि कब हम बड़े होगे....और आज हम बड़े सोचते हैं कि हम बच्चे ही रहते तो कितना अच्छा था।  

खैर....गर्मी भी वैशाख माह की थी और व्रज में तो वैसे भी गर्मी प्रचंड होती है। थोड़ी ही देर में बालक
श्री कृष्ण गर्मी से बेहाल हो गये पर अपनी जिद के आगे हार कैसे मानते....बाबा को कहते कैसे की थक
गया हूँ....अब घर ले चलो....सो चलते रहे....मैया होती तो खुद समझ के लाला को घर ले आती पर बाबा
थे....चलते रहे।  रास्ते में ललिता जी और कुछ अन्य सखियाँ मिली। देखते ही लाला की हालत समझ गयी. गर्मी से कृष्ण का मुख लाल हो गया था सिर पर बाल भी नही थे इसलिए लाला पसीना-पसीना हो गये थे।
उन्होंने नन्द बाबा से कहा कि आप इसे हमारे पास छोड़ जाओ. हम इसे कुछ देर बाद नंदालय पहुंचा देंगे।
नंदबाबा को रवाना कर वो लाला को निकट ही अपने कुंज में ले गयीं । 

उन्होंने बालक कृष्ण को कदम्ब की शीतल छांया में बिठाया और अपनी अन्य सखी को घर से चन्दन, खरबूजे के बीज, मिश्री का पका बूरा, इलायची, मिश्री आदि लाने को कहा । सभी सामग्री लाकर उन सखियों ने प्रेम भाव से कृष्ण के तन पर चन्दन की गोटियाँ लगाई और सिर पर चन्दन का लेप किया । कुछ सखियों ने पास में ही बूरे और खरबूजे के बीज के लड्डू बना दिए और इलायची को पीस कर मिश्री के रस में मिला कर शीतल शरबत तैयार कर दिया और बालक कृष्ण को प्रेमपूर्वक आरोगाया ।

साथ ही ललिता जी लाला को पंखा झलने लगी। यह सब अरोग कर लाला को नींद आने लगी तो ललिताजी ने उन्हें वहीँ सोने को कहा और स्वयं उन्हें पंखा झलती रही । कुछ देर आराम करने के बाद लाला उठे और ललिता जी उन्हें नंदालय छोड़ आयीं। आज भी अक्षय-तृतीया के दिन प्रभु को ललिता जी के भाव से बीज के लड्डू और इलायची का शीतल शर्बत आरोगाये जाते हैं व विशेष रूप से केशर मिश्रित चन्दन जिसमें मलयगिरी पर्वत का चन्दन भी मिश्रित होता है की गोटियाँ लगायी जाती हैं । लाला ने गर्मी में गाय चराने का विचार त्याग
दिया था। औपचारिक रूप से श्री कृष्ण ने गौ-चारण उसी वर्ष गोपाष्टमी (दीपावली के बाद वाली अष्टमी) के दिन से प्रारंभ किया और इसी दिन से उन्हें गोपाल कहा जाता है।

वर्ष में एक ये ही दिन ऐसा होता है जब बीज के लड्डू अकेले श्रीजी को आरोगाये जाते हैं अन्यथा अन्य
दिनों में बीज के लड्डू के साथ चिरोंजी के लड्डू भी आरोगाये जाते हैं

- जय श्री राधे राधे !!

Friday, April 10, 2015

भगवान श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिये


भगवान श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिये 


कहते है भगवान श्रीकृष्ण की पीठ के दर्शन नहीं करना चाहिए, दरअसल पीठ के दर्शन न करने के संबंध में भगवान श्रीकृष्ण के अवतार की एक कथा प्रचलित है. कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे तब जरासंध का एक साथी असुर कालयवन भी भगवान से युद्ध करने आ पहुंचा. कालयवन श्रीकृष्ण के सामने पहुंचकर ललकारने लगा.

तब श्रीकृष्ण वहां से भाग निकले. इस तरह रणभूमि से भागने के कारण ही उनका नाम रणछोड़ पड़ा. जब श्रीकृष्ण भाग रहे थे तब कालयवन भी उनके पीछे-पीछे भागने लगा. इस तरह भगवान रणभूमि से भागे क्योंकि कालयवन के पिछले जन्मों के पुण्य बहुत अधिक थे और कृष्ण किसी को भी तब तक सजा नहीं देते जब कि पुण्य का बल शेष रहता है.

जिस तरह शिशुपाल की गालिया भी भगवान तब तक सुनते रहे जब तक उसके पुण्य शेष थे.गालियाँ पूरी होते ही जैसे ही उसके पुण्य क्षीण हुए भगवान ने चक्र से उसकी गर्दन को काट दी.


इसी तरह कालयवन कृष्णा की पीठ देखते हुए भागने लगा और इसी तरह उसका अधर्म बढऩे लगा क्योंकि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है और उसके दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है.

"धर्म: स्तनोंsधर्मपथोsस्य पृष्ठम् " श्रीमद्भागवत में द्वितीय स्कंध के, द्वितीय अध्याय के श्लोक ३२ में शुकदेव जी राजा परीक्षित को भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन करते हुए कह रहे है- कि धर्म भगवान का स्तन और अधर्म पीठ है.

जब कालयवन के पुण्य का प्रभाव खत्म हो गया कृष्ण एक गुफा में चले गए. जहां मुचुकुंद नामक राजा निद्रासन में था. मुचुकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति राजा को निंद से जगाएगा और राजा की नजर पढ़ते ही वह भस्म हो जाएगा. कालयवन ने मुचुकुंद को कृष्ण समझकर उठा दिया और राजा की नजर पढ़ते ही राक्षस वहीं भस्म हो गया.

अत: भगवान श्री हरि की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे हमारे पुण्य कर्म का प्रभाव कम होता है और अधर्म बढ़ता है. कृष्णजी के हमेशा ही मुख की ओर से ही दर्शन करें. यदि भूलवश उनकी पीठ के दर्शन हो जाते हैं और भगवान से क्षमा याचना करनी चाहिए.

- जय श्री राधे राधे !!

Tuesday, April 7, 2015

राधा नाम की महिमा - Radhe Naam Ki Mahima

एक व्यक्ति था, एक बार एक संत उसके नगर में आये ! वह उनके दर्शन करने गया और संत से बोला - स्वामी जी ! मेरा एक बेटा है, वो न तो भगवान को मानता है, न ही पूजा-पाठ करता है, जब उससे कहो तो कहता है मै किसी संत को नहीं मानता, अब आप ही उसे समझाइये,स्वामी जी ने कहा - ठीक है, मैं तुम्हारे घर आऊँगा.




एक दिन वे उसके घर गए और उसके बेटे से बोले -बेटा एक बार कहो : राधा, बेटा बोला : मै क्यों कहूँ,स्वामीजी ने बहुत बार कहा, अंत में वह बोला मै ‘राधा’ क्यों कहूँ ! स्वामी जी ने कहा - जब तुम मर जाओ तो मरने पर यमराज से पूँछना कि एक बार राधा नाम लेने की क्या महिमा है, इतना कहकर वे चले गए ! एक दिन वह मर गया : यमराज के पास पहुँच गया, तब उसने पूँछा - आप मुझे बताये कि एक बार राधा नाम लेने की क्या महिमा है?

यमराज ने कहा - मुझे नहीं पता कि क्या महिमा है, शायद इन्द्र को पता होगा, चलो उससे पूछते है ! जब उसने देखा की यमराज तो कुछ ढीले पड़ रहे है, तो बोला- मै ऐसे नहीं जाऊँगा, पालकी मँगाओ, तुरंत पालकी आ गयी, उसने कहार से बोला - आप हटो, यमराज जी आप इसकी जगह लग जाओ ! यमराज लग गए, इंद्र के पास गए !

इंद्र ने पूछा – ये कोई खास है क्या? यमराज जी ने कहा-ये पृथ्वी से आया है और एक बार राधा नाम लेने की क्या महिमा है - पूँछ रहा है ! आप बताइये,

इंद्र ने कहा - महिमा तो बहुत है, पर क्या है - ये नहीं पता, ये तो ब्रह्मा जी ही बता सकते है !

व्यक्ति बोला - तुमभी पालकी में लग जाओ, अब उसकी पालकी में एक ओर यमराज दूसरी ओर इंद्र लग गए और ब्रह्मा जी के पास पहुँचे !

ब्रह्मा जी ने कहा- ये कोई महान व्यक्ति लगता है, जिसे ये पालकी में लेकर आ रहे है ! ब्रह्मा जी ने पूँछा : ये कौन है? तो यमराज जी ने कहा - ये पृथ्वी से आया है और एक बार 'राधा' नाम लेने की क्या महिमा है - पूँछ रहा है ! आप को तो पता ही होगा !

ब्रह्मा जी ने कहा –महिमा तो अनंत है, पर ठीक- ठीक तो मुझे भी नहीं पता, शंकरजी ही बता सकते है ! व्यक्ति ने कहा - तीसरी जगह पालकी में आप लग जाइये, ब्रह्मा जी भी लग गए ! पालकी लेकर शंकरजी के पास गए ! शंकरजी ने कहा ये कोई खास लगता है, जिसकी पालकी को यमराज, इंद्र, ब्रह्मा जी, लेकर आ रहे है, पूँछा तो ब्रह्मा जी ने कहा: ये पृथ्वी से आया है और एक बार राधा-नाम लेने की महिमा पूँछ रहा है ! हमें तो पता नहीं, आप को तो जरुर पता होगा, आप तो समाधी में सदा उनका ही ध्यान करते है

शंकर जी ने कहा - हाँ, पर ठीक प्रकार से तो मुझे भी नहीं पता, विष्णु जी ही बता सकते है ! व्यक्ति ने कहा – आप भी चौथी जगह लग जाइये, अब शंकर जी भी पालकी में लग गए !

अब चारो विष्णुजी के पास गए और पूँछा कि एक बार 'राधा-नाम' लेने की क्या महिमा है -

भगवान ने कहा : राधा नाम की यही महिमा है कि इसकी पालकी, आप जैसे देव उठा रहे है, ये अब मेरी गोद में बैठने का अधिकारी हो गए है !



“ जय जय श्री राधे ”


परम प्रिय श्री राधा-नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है -
"जिस समय मैं किसी के मुख से ’रा’अक्षर सुन लेता हूँ,उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदानकर देता हूँ और ’धा’ शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूँ !""
ब्रज के रसिक संतश्री किशोरी अली जीने इस भाव को प्रकट किया है :-

" आधौ नाम तारि है 
राधा 'र' के कहत रोग सब मिटि हैं, 'ध ' के कहत मिटै सब बाधा
राधा राधा नाम की महिमा, 
गावत वेद पुराण अगाधा अलि किशोरी रटौ निरंतर, 
वेगहि लग जाय भाव समाधा "

Sunday, April 5, 2015

कब कृपा करोगे सांवरिया कब कृपा करोगे बनवारी


वन वन ढूंढ रही थी तुमको बन के जोगन प्रेम दीवानी 

यही सोच के मिलेंगे हम तुम बन जाएगी प्रेम कहानी

है कोई जो मिलन करा दे मेरा प्रियतम मुझे मिला दे  

बिन सोचे बिन कारन ही मैं निकल पड़ी घर छोड़

सायद इस अबला पे तरस खा जाएंगे मन मोहन  

क्यों नहीं अपनाते मुझको अपना दरस दिखाते मुझको

माना की पापिन बहुत बड़ी हु पर तुम भी दयालु कम तो नहीं

मो पे कृपा करो गिरधारी मो पे कृपा करो गिरधारी

कब कृपा करोगे सांवरिया कब कृपा करोगे बनवारी

Kanha - कान्हा तुम्हें पाकर



ए "कान्हा" सुन रहे हो ना अधूरापन खत्म हो जाता है, "कान्हा" तुम्हें पाकर... 

दिल का हर "तार" गुनगुनाता है,  "कान्हा" तुम्हें पाकर... "गम" जाने किधर जाता है, "कान्हा" तुम्हे पाकर...

सब "सिकवे" दूर हो जाते हैं, "कान्हा" तुम्हें पाकर...

जानता हूँ चंद पलों की ज़िन्दगी है मेरी "अफ़सोस" नहीं रहता बाकी, "कान्हा" तुम्हे पाकर...

"राह" तकती हैं, ये लम्बी पगडंडीयां "थक" कर भी चैन पाती हैं, "कान्हा" तुम्हें पाकर...

तमाम "मायुशियाँ" छुप जाती हैं जिंदा "लाश" मानो उठ जाती है,  "कान्हा" तुम्हें पाकर...

"तनहा" मरना सब भूल जाती हूँ "कान्हा" तुम्हारा स्पर्श पाकर... "कान्हा" तुम्हें पाकर...



में तो तेरा पागल प्रेम दीवाना प्रेम करो कृष्णा।।

Tuesday, March 24, 2015

मुझे चाहो उस पागल की तरह




हमारे बाद नहीं आयेगा तुम्हें चाहत का ऐसा मज़ा "कन्हैया"…..

तुम लोगों से कहते फिरोगे मुझे चाहो उस पागल की तरह……..



जय श्री राधे राधे !!

श्री कृष्ण और एक अंग्रेज भगत कि सुन्दर कहानी

रोनाल्ड निक्सन जो कि एक अंग्रेज थे कृष्ण प्रेरणा से ब्रज में आकर बस गये …
उनका कन्हैया से इतना प्रगाढ़ प्रेम था कि वे कन्हैया को अपना छोटा भाई मानने लगे थे……
एक दिन उन्होंने हलवा बनाकर ठाकुर जी को भोग लगाया पर्दा हटाकर देखा 
तो हलवे में छोटी छोटी उँगलियों के निशान थे ……

जिसे देख कर 'निक्सन' की आखों से अश्रु धारा बहने लगी …
क्यूँ कि इससे पहले भी वे कई बार भोग लगा चुके थे पर पहलेकभी ऐसा नहीं हुआ था |
और एक दिन तो ऐसी घटना घटी कि सर्दियों का समय था, निक्सन जी कुटिया के बाहर सोते थे |
ठाकुर जी को अंदर सुलाकर विधिवत रजाई ओढाकर फिर खुद लेटते थे |

एक दिन निक्सन सो रहे थे……
मध्यरात्रि को अचानक उनको ऐसा लगा जैसे किसी ने उन्हें आवाज दी हो... दादा ! ओ दादा !
उन्होंने उठकर देखा जब कोई नहीं दिखा तो सोचने लगे हो
सकता हमारा भ्रम हो, थोड़ी देर बाद उनको फिर सुनाई दिया.... दादा ! ओ दादा !
उन्होंने अंदर जाकर देखा तो पता चला की वे ठाकुर जी को रजाई ओढ़ाना भूल गये थे |

वे ठाकुर जी के पास जाकर बैठ गये और बड़े प्यार से बोले...''आपको भी सर्दी लगती है क्या...?''
निक्सन का इतना कहना था कि ठाकुर जी के श्री विग्रह से आसुओं की अद्भुत धारा बह चली...
ठाकुर जी को इस तरह रोता देख निक्सनजी भी फूट फूट कर रोने लगे.....

उस रात्रि ठाकुर जी के प्रेम में वह अंग्रेज भक्त इतना रोया कि उनकी आत्मा उनके पंचभौतिक शरीर को छोड़कर बैकुंठ को चली गयी |  हे ठाकुर जी ! हम इस लायक तो नहीं कि ऐसे भाव के साथ आपके लिए रो सकें.....पर फिर भी इतनी प्रार्थना करते हैं कि....

''हमारे अंतिम समय में हमे दर्शन भले ही न देना पर…… अंतिम समय तक ऐसा भाव जरूर दे देना जिससे आपके लिए तडपना और व्याकुल होना ही हमारी मृत्यु का कारण बने....''.

बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय

जय जय श्री राधे राधे

Sunday, March 22, 2015

किसकी मोहब्बत ज्यादा है तुम्हारी या मेरी




भक्त ने भगवान कृष्ण से पूछा हे कृष्ण  

" किसकी मोहब्बत ज्यादा है, तुम्हारी,  या मेरी " 



भगवान कृष्ण ने मुस्कुरा के बोले कि -.


 " जा के समंदर के किनारे तुम अपने हाथों में पानी 

उठा लेना, 

जितना तुम उठा लो वो तुम्हारी चाहत ओर 

जो उठा न सको वो हमारी चाहत."


जय श्री राधे राधे !!


हक़ीक़त में भी बढ़ाया करो कान्हा नजदीकी हमसे !!
ख़्वाबों की मुलाक़ातों से तसल्ली नहीं होती !!

Thursday, March 19, 2015

केवल श्री कृष्ण के लिये धडकता है



ना रईस हूँ , ना अमीर हूँ ...

न मैं बादशाह हूँ ना वजीर हूँ ....

तेरा इश्क है मेरी सल्तनत ,  

मैं उसी सल्तनत का फ़क़ीर हूँ .......


खूबसूरत है वो लब ........ जिन पर ,

केवल श्री कृष्ण नाम ......की चर्चा है !!

खूबसूरत है ............ वो दिल जो ,  

केवल श्री कृष्ण के लिये धडकता है !!

खूबसूरत है वो जज़बात जो , 

श्री कृष्ण संग की भावनाओं को समझ जाए !!

खूबसूरत है.....वो एहसास जिस में , 

श्री कृष्ण प्रेम ......की मिठास हो जाए !!

खूबसूरत हैं ....... वो बाते जिनमे , 

श्री कृष्ण ......... की बाते शमिल हो !!

खूबसूरत है.......वो आँखे जिनमें , 

श्री कृष्ण के ..... दर्शन की प्यास है !!

खूबसूरत है .... वो हाथ जो  

श्री कृष्ण की सेवा में लगे रहते है !!

खूबसूरत है........... वो सोच जिसमें ,

केवल श्री कृष्ण की ही सोच हो !!

खूबसूरत हैं .......... वो पैर जो ,  

दिन रात केवल प्यारे श्री कृष्ण की तरफ बढ़ते है !!

खूबसूरत हैं ...... वो आसूँ , 

जो केवल प्यारे श्री कृष्ण के लिये बहते है !!

ख़ूबसूरत हैं..........वो कान , 

जो कृष्ण नाम के गुणगान सुनते हैं !!

ख़ूबसूरत हैं..........वो शीश , 

जो कृष्ण चरणों में नमन के लिये झुकते हैं !!

 जय श्री राधे राधे !!

Wednesday, March 18, 2015

कभी प्रीत लगाई नहीं वो प्रीत निभाना क्या जाने






जो प्रेम गली में आया ही नहीं कृष्णा प्रीतम का ठिकाना क्या जाने 

जिसने कभी प्रीत लगाई नहीं वो प्रीत निभाना क्या जाने 

जो वेद पढ़े और भेद करे मन में नहीं निर्मलता आई 

वह चाहे कितना ज्ञान कहे भगवान को पाना क्या जाने 


जय श्री राधे राधे !!


पुण्य कोटी जन्मों का उदित हो जाता हैं,  वृंदावन धाम में जो एक बार आ जाता हैं।
कामना न रहती किसी और बात की उसको, स्वर्ग पूर विमान यूँ कह कर फिराता हैं।
"ऐ हो देवदूतो !! क्यों विमान हो लाए यहाँ, अरे! वृंदावन छोड के बैकुंठ कौन जाता हैं।

Tuesday, March 17, 2015

हे कान्हा kanha





मैं दुनियाँ से यह नही कहता की मेरी परेशानी कितनी बड़ी है 

बल्कि परेशानी से कहता हु की मेरी डोर सांवरे से जुडी है 



......... हे कान्हा ..........


मेरे दिल के कोने कोने में कान्हा तेरा घर बन जाये 



ऐसा वरदान दो कान्हा मेरी में तुझे पुकारु और



तू सामने मेरे आ जाये नादान हूँ मै कान्हा 



मुझसे भूल कोई ना हो जाये  


मेरा दामन थाम के कान्हा तू सत की राह दिखाए 


मन में है विश्वास ये कान्हा कभी टूटने ना पाये 



मेरे दिल के कोने कोने में तेरा घर बन जाये



तुम्हारे चरणों का दास  



जय श्री राधे 


Monday, March 16, 2015

भगवान को खिचड़ी का भोग क्यू लगता है



कर्माबाई भगवान को बालभाव से भजती थीं. ठाकुरजी से पुत्र की तरह बातें करती. एक दिन बिहारीजी को अपने हाथ से कुछ बनाकर खिलाना चाहा.  गोपाल बोले- जो भी बना है वही खिला दो. खिचड़ी बनी थी. ठाकुरजी ने चाव से खाया. कर्माबाई पंखा झलने लगीं कि कहीं गोपाल के मुंह न जल जाएं.

भगवान ने कहा-मेरे लिए खिचड़ी पकाया करो. रोज सुबह उठतीं पहले खिचड़ी बनातीं. बिहारीजी आते खिचड़ी खाकर जाते. एकबार एक साधु कर्माबाईजी के घर आया.  उसने सुबह-सुबह खिचड़ी बनाते देखा तो कहा-नहा धोकर भगवान के लिए प्रसाद बनाओ.

कर्माबाई बोलीं-क्यां करूं,गोपाल सुबह-सुबह भूखे आ जाते हैं.  उसने चेताया भगवान को अशुद्ध मत करो.  स्नान के बाद रसोई साफ करो फिर भोग बनाओ.

सुबह भगवान आए और खिचड़ी मांगा. वह बोलीं-स्नान कर रही हूँ, रुको! थोड़ी देर बाद भगवान ने फिर आवाज लगाई.  वह बोलीं- सफाई कर रही हूं.  भगवान ने सोचा आज माँ को क्या हो गया.

भगवान ने झटपट खिचड़ी खायी, पर खिचड़ी में भाव का स्वाद नहीं आया. जल्दी में बिना पानी पिए ही भागे, संत को देखा तो समझ गए.

मंदिर के पुजारी ने पट खोले तो देखा भगवान के मुख से खिचड़ी लगी है. प्रभु! खिचड़ी आप के मुख में कैसे लगी.

भगवान ने कहा-आप उस संत को समझाओ, मेरी माँ को कैसी पट्टी पढाई. पुजारी ने संत से सारी बात कही. वह कर्माबाई से बोला- ये नियम संतो के लिए हैं. आप जैसे चाहो बनाओ.

एकदिन कर्माबाईजी के भी प्राण छूटे. उस दिन भगवान बहुत रोए. पुजारी ने भगवान को रोता देख कारण पूछा. वह बोले - आज माँ इस लोक से विदा हो गई. अब मुझे कौन खिचड़ी खिलाएगा.

पुजारी ने कहा- प्रभु माता की कमी महसूस न होने दी जाएगी. आज से सबसे पहले रोज खिचड़ी का भोग लगेगा

इस तरह आज भी जगन्नाथ भगवान को खिचड़ी का भोग लगता है.

जय श्री राधे राधे !!

Friday, March 13, 2015

राधा रानी की अष्ट सखियो के बारे मे जानते है

1. ललिता सखी - ये सखी सबसे चतुर और पिय सखी है। राधा रानी को तरह-तरह के खेल खिलाती है। कभी-कभी नौका-विहार, वन-विहार कराती है। ये सखी ठाकुर जी को हर समय बीडा(पान) देती रहती है। ये ऊँचे गाव मे रहती है। इनकी उम 14 साल 8 महीने 27 दिन है।




2. विशाखा सखी - ये गौरांगी रंग की है। ठाकुर जी को सुदंर-सुदंर चुटकुले सुनाकर हँसाती है। ये सखी सुगन्धित दव्यो से बने चन्दन का लेप करती है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 15 दिन है।

3.चम्पकलता सखी - ये सखी ठाकुर जी को अत्यन्त पेम करती है। ये करहला गाव मे रहती है।इनका अंग वण पुष्प-छटा की तरह है।ये ठाकुर जी की रसोई सेवा करती है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 13 दिन है।

4. चिता सखी - ये सखी राधा रानी की अति मन भावँती सखी है। ये बरसाने मे चिकसौली गाव मे रहती है। जब ठाकुर जी 4 बजे सोकर उठते है तब यह सखी फल, शबत, मेवा लेकर खड़ी रहती है। इनकी उम 14 साल 7 महीने 14 दिन है।

5. तुगंविधा सखी - ये सखी चदंन की लकड़ी के साथ कपूर हो ऐसे महकती है।ये युगलवर के दरबार मे नृत्य ,गायन करती है।ये वीणा बजाने मे चतुर है

ये गौरा माँ पार्वती का अवतार है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 22 दिन है।

6. इन्दुलेखा सखी - ये सखी अत्यन्त सुझबुझ वाली है। ये सुनहरा गाव मे रहती है।ये किसी कि भी हस्तरेखा को देखकर बता सकती है कि उसका क्या भविष्य है। ये पेम कहानियाँ सुनाती है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 10 दिन है।

7. रगंदेवी सखी - ये बड़ी कोमल व सुदंर है। ये राधा रानी के नैनो मे काजल लगाती है और शिंगार करती है।इनकी उम 14 साल 2 महीने 4 दिन की है।

8.सुदेवी सखी - ये सबसे छोटी सखी है। बड़ी चतुर और पिय सखी है। ये सुनहरा गाव मे रहती है। ये ठाकुर जी को पानी पिलाने की सेवा करती है।इनकी उम 14 साल 2 महीने 4 दिन की है।


जय श्री राधे राधे !!

Wednesday, March 11, 2015

भगवान कृष्ण की लीलाएँ - Lord Krishna Story


बहुत समय पहले की बात है वृन्दावन में श्रीबांके बिहारी जी के मंदिर में रोज पुजारी जी बड़े भाव से सेवा करते थे। वे रोज बिहारी जी की आरती करते , भोग लगाते और उन्हें शयन कराते और रोज चार लड्डू भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे। उनका यह भाव था कि बिहारी जी को यदि रात में भूख लगेगी तो वे उठ कर खा लेंगे। और जब वे सुबह मंदिर के पट खोलते थे तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था। इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे।

एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद वे चार लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बंद किए और चले गए। रात में करीब एक-दो बजे , जिस दुकान से वे बूंदी के लड्डू आते थे , उन बाबा की दुकान खुली थी। वे घर जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक आया और बोला बाबा मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए।

बाबा ने कहा - लाला लड्डू तो सारे ख़त्म हो गए। अब तो मैं दुकान बंद करने जा रहा हूँ। वह बोला आप अंदर जाकर देखो आपके पास चार लड्डू रखे हैं। उसके हठ करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हें चार लड्डू मिल गए क्यों कि वे आज मंदिर नहीं गए थे। बाबा ने कहा - पैसे दो।

बालक ने कहा - मेरे पास पैसे तो नहीं हैं और तुरंत अपने हाथ से सोने का कंगन उतारा और बाबा को देने लगे। तो बाबा ने कहा - लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो , कल अपने बाबा से कह देना , मैं उनसे ले लूँगा। पर वह बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फैंक कर भाग गया। सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो उन्होंने देखा कि बिहारी जी के हाथ में कंगन नहीं है। यदि चोर भी चुराता तो केवल कंगन ही क्यों चुराता। थोड़ी देर बाद ये बात सारे मंदिर में फ़ैल गई।

जब उस दुकान वाले को पता चला तो उसे रात की बात याद आई। उसने अपनी दुकान में कंगन ढूंढा और पुजारी जी को दिखाया और सारी बात सुनाई। तब पुजारी जी को याद आया कि रात में , मैं लड्डू रखना ही भूल गया था। इसलिए बिहारी जी स्वयं लड्डू लेने गए थे।

यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है तो भगवान अपनी तरफ से पूरा कर लेते हैं।

जय जय श्री राधे कृष्णा

Sunday, March 8, 2015

मिठाइयो पे लगा चाँदी का वर्क क्या है - chandi ka work

जिसको चाँदी का वर्क कह के मिठाइयो पे लगाया जाता है, क्या आप जानते है वो असल में क्या चीज है और कैसे बनता है....???



chandi ka work

आप को जब ये पता चलेगा तो आप उस से बनी हुई मिठाई खाना तो दूर, आप उसे देखते पे भी उस पे घिन्न आयेगी...

अब जानते है ये चांदी का वर्क बनता कैसे है- 

असल में यह वर्क चाँदी का होता ही नहीं है। यह एल्युमिनियम जैसी एक चमकीली धातु से बनाया जाता है।
आप को ये बताना चाहता हूँ की जब गौमाता को मारा जाता है तो गौ माता के पेट से जो आंत निकलती है सिर्फ उससे ही वर्क बन सकता है।

ध्यान रहे :  यह अन्य किसी भी पशु की आंत से या किसी अन्य वस्तु से कभी नहीं बन सकती....
यह बनती है, आंत को काट कर उसके अंदर उस चमकीली चाँदी जैसी धातू का वर्क का बड़ा टुकड़ा
डाल दिया जाता है और फिर उस चमकीली धातु को गाय की आत में डाल कर लकड़ी के हतोड़े से खूब देर
पिटाई की जाती है

जिससे आंत फ़ैल जाती है क्यों की गऊ की आंत कभी नहीं फटती वर्क जो आसानी से पिटाई के दोरान फ़ैल
जाता है और पूरी आंत वर्क में बदल जाती है 

लेकिन हम इतने शर्म-निर्पेक्स हैं कि हममे से कइयो को कुछ पता होते हुए भी वर्क वाली मिठाइयो का सेवन कर गौहत्या बढ़ाने का पाप कर रहे हैं....

आप सब से एक नम्र निवेदन :
सभी गौ रक्षक, गौ प्रेमियों आओ हम सब कसम खाये की हमारे घर पर चाँदी के वर्क लगी मिठाई या कोई अन्य खाने की वस्तु को ना हम आपने घर पर लायेगे और ना ही किसी को उपहार में देंगे हमें चाँदी जैसी चमकीली धातु वाले वर्क की लगी मिठाई ना हम खायेगे और ना ही आपने परिवार, सगे सबंधियो एवं
मित्रो को खाने देगे ....

जिस दिन से हम ये करने लगेगे आप देख लेना 3०-40% बुचड खाने बंद हो जायेगे ...... चाँदी वर्क बनाने के लिए भारत मे हर साल एक लाख सोलह हजार गायों का क़त्ल  किया जाता हे ......

चाँदी का वर्क गाय की आंतड़ियों के बीच रखकर कुट कर बनाया जाता हे........आप चांदी के  वर्क लगी मीठाई
नहीं खाये..............नहीं तो आप ओर गोमांस भक्षी मे कोई अंतर नहीं होगा , ओर हम ही भागी होंगे हर
साल होने वाली 1,16,000 गायों की हत्या के लिए...... आप अगर मीठाई की दुकान चलाते हे तो चाँदी का वर्क
लगी मिठाई ना बेचे ..... मेरे भाइयों।

गौहत्या को रोकने के हम एकीकृत छोटे छोटे प्रयास हम अपने स्वयं से शुरू करे।

आप इस आन्दोलन की शुरुआत हम अपने घर से करे, 



चाँदी के वर्क वाली मिठाई ना तो ख़रीदे, ना किसी की दी हुई स्वीकार करे और ना ही बेचे। जिस भी घर आप मिलने जाओ, वहा यदि आपकी चाँदी वर्क वाली मिठाई दी जाती है तो उसे ना खाए और उन घर वालो को भी संक्षिप्त में बताये कि आप क्यों नहीं खा रहे है। 

- Jai Shree Radhe Radhe

Wednesday, March 4, 2015

Few Adjustment You Need In Life


 गरीब दूर तक चलता है..... खाना खाने के लिए......।

 अमीर मीलों चलता है..... खाना पचाने के लिए......।

 किसी के पास खाने के लिए..... एक वक्त की रोटी नहीं है.....

 किसी के पास खाने के लिए..... वक्त नहीं है.....।

 कोई लाचार है.... इसलिए बीमार है....।

 कोई बीमार है.... इसलिए लाचार है....।

 कोई अपनों के लिए.... रोटी छोड़ देता है...।

 कोई रोटी के लिए..... अपनों को छोड़ देते है....।

 ये दुनिया भी कितनी निराळी है। कभी वक्त मिले तो सोचना....

गौरे गौरै मुखड़े को कर दिया लाल - Holi With Shree Radhe



"मथुरा की खुशबू, 
 गोकुल का हार, 
 वृन्दाबन की सुगंध,
 बरसाने की फुहार,
 राधा की उम्मीद,
 कान्हा का प्यार,
 मुबारक हो आपको,
 होली का अग्निम त्यौहार

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